भारत में होली का नाम सुनते ही रंग, गुलाल, ढोल-नगाड़े और मस्ती की तस्वीर सामने आ जाती है। फाल्गुन का महीना आमतौर पर पूरे देश को रंगों में सराबोर कर देता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के खरहरी गांव में पिछले करीब 150 सालों से होली नहीं मनाई जाती। यहां न तो होलिका दहन होता है और न ही रंग-गुलाल खेला जाता है।
क्या है 150 साल पुरानी कहानी?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब डेढ़ सौ साल पहले होली के दिन गांव में एक बड़ी अनहोनी हुई थी। बताया जाता है कि होलिका दहन के दौरान आग बेकाबू हो गई और कई घर उसकी चपेट में आ गए। इस घटना में गांव को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद ग्रामीणों ने सामूहिक निर्णय लेते हुए गांव की सीमा के भीतर होली न मनाने की परंपरा शुरू कर दी।
नहीं किया जाता होलिका दहन
जहां पूरे देश में होली से एक दिन पहले होलिका दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं खरहरी गांव में यह परंपरा पूरी तरह बंद है। गांव के लोग उस दिन लकड़ियां इकट्ठा नहीं करते और न ही किसी प्रकार का आयोजन किया जाता है।
फिर कैसे मनाते हैं त्योहार?
गांव में होली का विरोध नहीं है, लेकिन इसे गांव की सीमा के बाहर मनाने की अनुमति है। यदि कोई व्यक्ति रंग खेलना चाहता है तो वह गांव की चौहद्दी से बाहर जाकर त्योहार मना सकता है। हालांकि गांव के अंदर रंग, गुलाल या जश्न की इजाजत नहीं है। इस नियम का पालन ग्रामीण बिना किसी विवाद के करते हैं।
परंपरा तोड़ने की कोशिश और मान्यता
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ वर्ष पहले इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की गई थी, लेकिन उसी दौरान गांव में बीमारी फैलने की चर्चा हुई। इसके बाद ग्रामीणों का विश्वास और मजबूत हो गया कि यह परंपरा गांव की भलाई से जुड़ी है।
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