सहजपाली (छत्तीसगढ़) – ग्राम पंचायत सहजपाली में सरपंच सत्या घनशयाम इजारदार के खिलाफ लंबे समय से चली आ रही शिकायत और विवाद ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया है। पिछले कार्यकाल में भी सरपंच रह चुके इजारदार पर वित्तीय अनियमितताओं और जनहित विरोधी गतिविधियों का आरोप लग चुका है। हालांकि, जांच और प्रारंभिक रिपोर्ट में दोष सिद्ध होते हुए भी प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रियाओं में भारी विलंब और अनियमितता देखने को मिली, जिससे सरपंच ने अपनी कुर्सी पर बने रहने में सफलता पाई।
शिकायत और जांच प्रक्रिया
सहजपाली पंचायत के पूर्व सरपंच और शिकायतकर्ता अजय कुमार साहू ने बरमकेला जनपद पंचायत में धारा 40(घ) के तहत लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में सरपंच के भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की बातें शामिल थीं। शिकायत के बाद जनपद सीईओ अजय पटेल ने जांच टीम गठित की, जिसने प्रारंभिक जांच में शिकायतकर्ता की बातें सही पाई।
इसके बाद भी जनपद सीईओ ने धारा 92 का हवाला देते हुए एसडीएम को पत्र जारी किया। शिकायतकर्ता ने सीईओ से अनुरोध किया कि जांच का अवलोकन सही तरीके से किया जाए और एसडीएम को सही जानकारी भेजी जाए। इसके बावजूद सीईओ ने धारा 40(घ) के हवाले से अनुविभागीय अधिकारी को पत्र भेजा।
सरपंच की मिलीभगत और कथित दबाव
जांच के दौरान सरपंच सत्या घनशयाम इजारदार ने कथित रूप से अपने वकील के माध्यम से समय मांगा और दावा किया कि उन्होंने लगभग 1,82,000 रुपए की रिकवरी पूरी कर दी है। इसके बावजूद एसडीएम कार्यालय ने नोटिस जारी किया कि धारा 40(घ) के तहत उन्हें पद से मुक्त क्यों न किया जाए।
जांच पूरी होने के बाद भी कोविड-19 को हवाला देते हुए जांच टीम ने सरपंच को कुर्सी पर बनाए रखा। प्रथम जांच प्रतिवेदन और पुनः जांच प्रतिवेदन का अवलोकन करने पर जमीन और आसमान का अंतर स्पष्ट था, लेकिन अनुविभागीय दंडाधिकारी ने सरपंच को सहजपाली पंचायत का पदाधिकारी घोषित कर दिया।
शिकायतकर्ता की उपेक्षा
सबसे बड़ी विडम्बना यह रही कि इस पूरी प्रक्रिया में शिकायतकर्ता अजय कुमार साहू की उपस्थिति को नजरअंदाज किया गया। उच्च अधिकारियों द्वारा बिना शिकायतकर्ता की जानकारी और बिना उनकी उपस्थिति के निर्णय लेना लोकतांत्रिक और प्रशासनिक दृष्टि से गंभीर सवाल है।
शिकायतकर्ता ने बताया कि “जनपद और अनुविभागीय अधिकारी सत्या घनशयाम इजारदार की ओरदारी में काम कर रहे हैं। जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट तथ्य होने के बावजूद प्रशासन ने उसे कुर्सी बचा दिया। बिना हमारी उपस्थिति के फैसला लेना प्रशासन की जवाबदेही पर गंभीर चोट है।”
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