पहले ‘लाल गलियारे’ (बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश) में ठेकेदार काम करने से डरते थे। अब केंद्र सरकार ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को मुख्य इलाकों में सड़कें बनाने का काम दिया। इसमें विद्रोह के इन गढ़ों में पांच मुख्य सड़कों और छह ज़रूरी पुलों का निर्माण शामिल था। माओवादी से प्रभावित इलाकों में 15,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई गई हैं, जिनमें से 12,250 किलोमीटर सड़कें अकेले पिछले 10 वर्षों में पूरी की गई हैं।
सुरक्षा के मोर्चे पर बड़े बदलाव
सुरक्षा के मोर्चे पर भी बड़े बदलाव हुए हैं। साल 2014 में केवल 66 मजबूत पुलिस स्टेशन थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 586 हो गई है। पिछले 6 साल में 361 नए सुरक्षा कैंप बने हैं। ऑपरेशन की ताकत बढ़ाने के लिए 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड भी बनाए गए हैं। इसका असर यह हुआ कि नक्सली घटनाओं वाले पुलिस स्टेशनों की संख्या 330 से घटकर सिर्फ 52 रह गई है। छत्तीसगढ़ में पहली बार माओवादी आंदोलन बिना किसी बड़े नेता के रह गया है।
आम लोगों तक पहुंच रहीं योजनाएं
इसका असर है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अब आम लोगों तक पहुंच रहा है। पीएम-आवास योजना के तहत घरों की संख्या 92,847 से बढ़कर 2.54 लाख से ज्यादा हो गई है। आधार नामांकन और आयुष्मान कार्डों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। शिक्षा के लिए 250 एकलव्य स्कूल मंजूर हुए हैं, जिनमें से 179 चल रहे हैं। इनके अलावा, 11 केंद्रीय विद्यालय और 6 नवोदय विद्यालय भी संचालित हो रहे हैं।
युवाओं को रोजगार देने के लिए 48 जिलों में आईटीआई और कौशल विकास केंद्र बनाए गए हैं। इससे नक्सलियों की नई भर्ती रुकी है। संचार के लिए 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए हैं। रेलवे ने भी बस्तर से छत्तीसगढ़ के बीच रेल लाइन बिछाई है। दंतेवाड़ा से मुनुगुरु तक नई रेल लाइन का सर्वे भी पूरा हो गया है।अर्बन नक्सलियों पर नकेल
नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए एनआईए और ईडी ने करोड़ों रुपये की संपत्ति जब्त की है। इससे शहरी नक्सलियों और उनके सूचना तंत्र को गहरा नुकसान पहुंचा है। सरकार की नई पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद, ट्रेनिंग और घर भी दिया जा रहा है।