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सिरपुर महोत्सव: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में पर्व, मड़ई और मेलों की परंपरा सदियों से रची-बसी है। इनमें सिरपुर महोत्सव का विशेष महत्व है, जो प्रतिवर्ष पवित्र महानदी के तट पर माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित किया जाता है। इस वर्ष तीन दिवसीय सिरपुर महोत्सव 01 से 03 फरवरी 2026 तक भव्य रूप में मनाया जा रहा है।


माघ पूर्णिमा की भोर से शुरू होता महोत्सव, महानदी में पुण्य स्नान और गंधेश्वर नाथ महादेव का पूजन

माघी पूर्णिमा की सुबह आस-पास के ग्रामीण और श्रद्धालु महानदी में पुण्य स्नान कर गंधेश्वर नाथ महादेव के दर्शन और पूजन के साथ महोत्सव की शुरुआत करते हैं। तीन दिन तक महानदी में सांध्य आरती का आयोजन होता है। यह परंपरा सिरपुर की आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाती है।


सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों की प्रस्तुति

हर वर्ष आयोजित होने वाला सिरपुर महोत्सव छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। इसमें देश-विदेश के कलाकार शास्त्रीय नृत्य, संगीत और नाट्य प्रस्तुतियों से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। जिला प्रशासन द्वारा महोत्सव में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिए विशेष आवागमन व्यवस्था की गई है।


सुविधाजनक आवागमन: बस सेवा और रूट प्रबंधित

महोत्सव अवधि के दौरान रायपुर से कुहरी मोड़ तक तथा जिले के सभी विकासखंड मुख्यालयों से सिरपुर तक बसों का प्रबंध किया गया है। निर्धारित रूटों पर बसें नियमित अंतराल में संचालित होंगी, जिससे अधिक से अधिक लोग महोत्सव में भाग ले सकेंगे।


सिरपुर का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हेरिटेज स्थल के रूप में विकास

सिरपुर को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने हेतु शासन पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने सिरपुर को विश्व पर्यटन मानचित्र पर लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। विजन 2047 के तहत आधुनिक बुनियादी ढांचा, सड़क, प्रकाश व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पर्यटक कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है।


सिरपुर की पुरातात्त्विक संरचनाओं का संरक्षण और आधुनिक तकनीक का उपयोग

सिरपुर की पुरातात्त्विक संरचनाओं को संरक्षित रखने के लिए अत्याधुनिक तकनीकें अपनाई जा रही हैं। मंदिर, विहार, मूर्तियाँ और जीवंत परंपराएँ भारत की संस्कृति, सहिष्णुता, कला और ज्ञान का संगम प्रस्तुत करती हैं। ईको-ट्रेल, हस्तशिल्प बिक्री केंद्र और स्थानीय भोजनालय स्थापित कर स्थानीय समुदाय को रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है।


सिरपुर: दक्षिण कोसल की प्राचीन राजधानी और सांस्कृतिक धरोहर

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित सिरपुर (श्रीपुर) केवल एक पुरातात्त्विक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों का जीवंत प्रतीक है। यह नगर दक्षिण कोसल के महान सम्राट महाशिवगुप्त बालार्जुन की राजधानी रहा है और स्थापत्य कला, बौद्ध धरोहरों तथा प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।


धार्मिक सहिष्णुता और ऐतिहासिक महत्व

सिरपुर का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों और अभिलेखों में मिलता है। यहां भगवान शिव, विष्णु, बुद्ध और जैन धर्म के उपासना स्थलों के अवशेष मिले हैं। 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी सिरपुर का उल्लेख किया, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति सिद्ध होती है। 22 शिव मंदिर, 5 विष्णु मंदिर, 3 जैन विहार और विशाल बौद्ध विहार के अवशेष यहाँ पाए गए हैं।


सिरपुर में बौद्ध, जैन और हिन्दू कला का त्रिवेणी संगम

सिरपुर बौद्ध, जैन और हिन्दू स्थापत्य कला का त्रिवेणी संगम प्रस्तुत करता है। लक्ष्मण मंदिर भारत का पहला ईंटों से निर्मित मंदिर है, आनंद प्रभु कुटीर विहार बौद्ध भिक्षुओं का प्रमुख केंद्र है और गंधेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। 1872 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा सिरपुर के अवशेषों की खोज की गई और इसके बाद अनेक उत्खनन कार्य हुए।


सिरपुर की वैश्विक महत्ता

सिरपुर के बौद्ध, शिव, विष्णु और जैन अवशेषों की खोज से यह साबित होता है कि यह स्थल न केवल भारत, बल्कि एशिया की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के विद्वान इसे एशिया की प्रमुख बौद्ध धरोहर मानते हैं।