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मासूम बच्चों की जान से खिलवाड़: बिना पीली पट्टी के धड़ल्ले से दौड़ रहे स्कूली वाहन, जिम्मेदार विभागीय नुमाइंदे बने मूक दर्शक

कमर्शियल रजिस्ट्रेशन के बिना धड़ल्ले से बच्चों को ढो रही बसें-वैनें-ऑटो, ओवरलोडिंग और अनफिट हालत में चल रहे वाहन, जिम्मेदारो की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल….

कैलाश आचार्य/रायगढ़। जिले में बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून और मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और जिम्मेदार विभागीय नुमाइंदे आंखें मूंदे बैठा है। शहर और ग्रामीण इलाकों में निजी वाहन — जैसे मिनी बसें, मारुति वैन, ओमनी और ऑटो — बिना किसी कमर्शियल पंजीयन के अवैध रूप से स्कूली बच्चों की सवारी ढो रहे हैं। न तो इन वाहनों पर अनिवार्य पीली पट्टी है, न फिटनेस, न बीमा और न ही सुरक्षा मानकों का कोई पालन। इसके बावजूद ये वाहन हर सुबह-शाम सड़कों पर फर्राटे भरते नजर आते हैं।

ये वाहन न केवल नियमों का उल्लंघन हैं बल्कि सीधे-सीधे बच्चों की जान के दुश्मन बन चुके हैं। ओवरलोडिंग आम बात है, कई वाहनों में बच्चे खड़े होकर सफर कर रहे हैं, कहीं दरवाजे लॉक नहीं होते तो कहीं खिड़कियों में सुरक्षा ग्रिल तक पूरी नहीं है। कई वाहनों में तो स्कूल का नाम, संपर्क नंबर और यहां तक कि नंबर प्लेट तक स्पष्ट नहीं होती। यह लापरवाही नहीं — बल्कि एक संगठित आपराधिक उदासीनता है, जिसकी जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन, वाहन संचालक, परिवहन विभाग और प्रशासन तीनों पर बराबर बनती है।

प्रशासन की घोर लापरवाही…
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब कुछ पुलिस प्रशासन और परिवहन विभाग की जानकारी में होते हुए भी बेरोकटोक चल रहा है। कभी-कभार अभियान चलाकर कुछ चालान काट दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अवैध स्कूली वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यह साफ संकेत है कि कार्रवाई दिखावटी है और निगरानी नाम की कोई चीज़ जमीन पर मौजूद नहीं है।

खतरनाक इसलिए हैं ये वाहन क्योंकि —
ज्यादातर बिना पंजीकृत वाहन पुराने और जर्जर हालत में हैं और नियमित फिटनेस जांच नहीं होती। बीमा नहीं होता, ऐसे में दुर्घटना की स्थिति में बच्चों और अभिभावकों को कोई सुरक्षा और हर्जाना नहीं मिल पाता। ये प्रशिक्षित और अनुभवी चालक नहीं होते। सुरक्षा उपकरण जैसे स्पीड अलार्म, फर्स्ट-एड बॉक्स और अग्निशमन यंत्र गायब रहते हैं।

स्कूल वाहन के अनिवार्य मानक जिनकी खुलेआम अनदेखी हो रही है :
वाहन का रंग सुनहरा और उस पर पीली पट्टी अनिवार्य है, आगे-पीछे दरवाजों के अलावा दो इमरजेंसी गेट होनी चाहिए, सीटों के नीचे बैग रखने की व्यवस्था हो। स्पीड अलार्म और फर्स्ट-एड बॉक्स , एलपीजी वाहनों में अग्निशमन यंत्र लगा हो। कम से कम पाँच वर्ष का अनुभव रखने वाले चालक होना चाहिए लेकिन इनमें से अधिकतर मानक केवल कागजों में मौजूद हैं, सड़कों पर नहीं।

यह सीधी चेतावनी है…
अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो किसी दिन कोई बड़ा हादसा होना तय है और तब प्रशासन के पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

समाधान और मांग :
बिना कमर्शियल रजिस्ट्रेशन के चल रहे सभी स्कूली वाहनों को तत्काल जब्त किया जाए। नियमित और सख्त जांच अभियान चलाया जाए। नियम तोड़ने वाले स्कूल प्रबंधन और वाहन संचालकों पर भारी जुर्माना और लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्रवाई हो।
अभिभावक भी सजग हों और अपने बच्चों को ऐसे अवैध वाहनों में बैठाने से साफ इंकार करें।

बहरहाल मासूम बच्चों की जान कोई प्रयोगशाला नहीं है, जिस पर प्रशासन अपनी उदासीनता के प्रयोग करता रहे। अब समय आ गया है कि कानून सिर्फ किताबों में नहीं, सड़कों पर भी नजर आए।